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विनाशकारी है गुरु-चाण्डाल योग, इसके दुष्प्रभाव से कैसे बचें

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अनेक ज्योतिषीय दोषों में कुछ ऐसे महान दोष भी शामिल हैं, जो किसी भी जातक के जीवन को नर्क से भी बदतर बना देते हैं। ऐसे में उस जातक को कहीं भी सहारा नहीं मिलता तथा वह बेहद परेशान, विपन्न होकर भारी समस्याओं से संकटग्रस्त हो जाता है। आपने साढ़ेसाती, कालसर्प दोष, मंगल दोष आदि के बारे में पहले भी सुना होगा। किंतु इन सबसे बढ़कर दोष तब जन्म लेता है जबकि देवगुरु बृहस्पति के साथ अथवा दृष्टि संबंध बनाता हुआ राहु मौज़ूद हो।

राहु-गुरु की युति या दृष्टि संबंध से एक खास प्रकार का योग जन्म लेता है, जिसे गुरु-चांडाल योग के नाम से जाना जाता है। इस संबंध की सबसे बड़ी खराबी ये है कि गुरु तो देव गुरु हैं तथा उनका संबंध एक महान असुर राहु से बनने के कारण वे स्वयं अपनी आत्मरक्षा करने में रत हो जाते हैं। गुरु की इस परिस्थिति का लाभ असुर राहु खूब उठाता है तथा कदम-कदम पर गुरु को पथभ्रष्ट करने की कोशिश करता है।

वह गुरु के विरुद्ध षड़यंत्र रचता है, उन्हें अनैतिक व्यवहार अपनाने के लिए प्रेरित करता है। पराई स्त्रियों में मन लगवाता, चारित्रिक पतन के बीज बो देता है। इसके अलावा ऐसा राहु चोरी, जुआ, सट्टा, अनैतिक तरीके से धन अर्जन की प्रवृत्ति, मद्यपान सहित हिंसक व्यवहार आदि प्रवृत्तियों को बढ़ावा देता है।

कुल मिलाकर यह संयोग गुरु की सभी सद्वृत्तियों के समापन के साथ दुष्प्रवृत्तियों का जन्मदाता सिद्ध होता है। इसके साथ ऐसा चाडाल योग जातक को कदम-कदम पर चालबाजी की प्रवृत्ति अपनाने को विवश करता है। जिस कारण जातक खुद को पतन की पराकाष्ठा पर ले जाता है। अब यहां ये बात अवश्य जाननी चाहिए कि यदि किसी इंसान को ऐसा योग पीड़ित कर रहा हो तो उसे क्या उपाय आजमाने चाहिए।

 ध्यान रहे: राहु की शांति कराएं – जप-तप-दान आदि के द्वारा

गुरु को मजबूत बनाएं ताकि वह राहु के प्रभाव को सीमित रख सके। इसके अलावा हनुमत आराधना तथा किसी भी इष्ट देव के रक्षा स्तोत्र का पाठ करें......................
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