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ज्योतिष के मुख्य ग्रंथों की सूची

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भारत में विकसित ज्योतिष प्रणाली के आधार पर लिखे प्राचीन काल के ज्योतिषगणना संबंधी कुछ ग्रंथ ऐसे हैं  जिनके लेखकों ने अपने नाम नहीं दिए हैं। ऐसे ग्रंथ हैं वेदांग ज्योतिष (काल ई पू 1200); पंचसिद्धांतिका में वर्णित पाँच ज्योतिष सिद्धांत ग्रंथ। कुछ ऐसे भी ज्योतिष ग्रंथकार हुए हैं जिनके वाक्य अर्वाचीन ग्रंथों में उद्धृत हैं किंतु उनके ग्रंथ नहीं मिलते। उनमें मुख्य हैं नारद, गर्ग, पराशर, लाट, विजयानंदि, श्रीषेण, विष्णुचंद आदि। अलबेरूनी के लेख के आधार पर लाट ने मूल सूर्यसिद्धांत के आधार पर इसी नाम के एक ग्रंथ की रचना की है। श्रीषेण के मूल वसिष्ठ सिद्धांत के आधार पर वसिष्ठ-सिद्धांत लिखा। ये सब ज्योतिषी ब्रह्मगुप्त (शक संवत् 520) से पूर्व हुए है। श्रीषेण आर्यभट के बाद तथा ब्रह्मगुप्त से पूर्व हुए हैं। कुछ ऐसे भी ग्रंथ है जिनके बिना ज्योतिष भविष्यवाणी करना लगभग असंभव है। 

ज्योतिष शास्त्र के द्वारा मनुष्य हर तरह के विषय में जान जाता है। सूर्योदय, सूर्यास्त, चन्द्र-सूर्य ग्रहण, ग्रहों की स्थिति, ग्रहों की युति, ग्रह युद्ध, चन्द्र श्रृगान्नति, ऋतु परिवर्तन, अयन एवं मौसम के बारे में सही-सही व महत्वपूर्ण जानकारी लेने के लिए ज्योतिष विद्या का उपयोग किया जाता है और इसलिए ज्योतिष विद्या का बड़ा महत्व है।

ज्योतिष शास्त्र की तीन शाखा होती है- 

1. प्रथम शाखा सिद्धान्त- 

प्रथम शाखा सिद्धान्त होती है। सिद्धान्त शाखा में कई विषय आते है जिसमें त्रुटि से लेकर प्रलय काल तक की गणना, सौर, सावन, नक्षत्रादि, मासादि, काल मानव का प्रभेद, ग्रह संचार का विस्तार तथा गणित क्रिया की उत्‍पति आदि द्वारा ग्रहों, नक्षत्रों, पृथ्वी की स्थिति का वर्णन किया जाता है। इस शाखा के प्रमुख ग्रंथ ग्रह लाघव, मकरन्द, ज्योर्तिगणित, सूर्य सिद्धान्तादि प्रसिद्ध है।

2. द्वितीय शाखा संहिता- 

द्वितीय शाखा संहिता में कई विषय जैसे अंतरिक्ष, ग्रह, नक्षत्र, ब्रह्माण्ड आदि की गति, स्थिति एवं ततत् लोकों में रहने वाले प्राणियों की क्रिया विशेष द्वारा समस्त लोकों का समष्टिगत फलों का वर्णन है। 

3. तृतीय शाखा होरा - 

तृतीय शाखा होरा में जातक, जातिका, मुहूर्त प्रश्नादि का विचार कर व्यष्टि परक या व्यक्तिगत फलादेश का वर्णन है। इस शाखा के प्रसिद्ध ग्रंथ वृहत् जातक, वृहत् पाराशर होरशास्त्र, सारावली, जातक पारिजात, फलदीपिका, उत्तरकालामृत, लघुपाराशरी, जैमिनी सूत्र और प्रश्नमार्गादि प्रमुख ग्रंथ है।

कुछ ऐसे ही ग्रन्थ है :

1. उत्तरकालामृत ग्रन्थ 

दक्षिण भारत के प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य कालीदास (कवि कालीदास से भिन्न) ने तेरहवीं शताब्दी में प्रसिद्ध ग्रंथ उत्तरकालामृत ग्रन्थ की रचना की थी। इस ग्रन्थ के आधार पर अनेकानेक शुभ-अशुभ लगनों का शोधन किया जाता है। उत्तरकालामृत ग्रन्थ नामक इस ग्रंथ में विवाह, मुंडन, गृह प्रवेश, कर्ण छेदन, यज्ञोपवीत सहित गर्भाधान, पुंसवन आदि अनेक संस्कारों के लिए शुभाशुभ मुहूर्तों की गणना और व्याख्या दी गई है।

उत्तरकालामृत के नाम ही इसकी विशेषता है। इस ग्रन्थ को पढ़ने वाले को अमृत की प्राप्ति निश्चय है। इस ग्रन्थ को निश्चय ही काल मंथन कर अमृत पर्पटी का एक जरिया बताया गया है। कालिदास ने अपने ग्रंथ ‘पूर्व कालामृत’ और ‘उत्तर कालामृत’ में नौ नक्षत्र और बारह राशियां मिलाकर एक सौ आठ की संख्या बनाई। इस ग्रन्थ में विवाह, विरुद्ध-सम्बन्ध आदि पर विवरण प्राप्त है। उत्तरकालामृत ग्रन्थ एक मात्र जातक ग्रन्थ है जिसमें मुहूर्त और कर्मकांड को भी सम्मिलित किया गया है। इस ग्रन्थ में काल का समग्र, समन्वित और संतुलित वर्णन है।

2. लघुपाराशरी 

लघुपाराशरी  एक ऐसा ग्रन्थ है जिसके बिना फलित ज्योतिष का ज्ञान अधूरा है। पाराशरी सिद्धांतों का लघुपाराशरी में वर्णन किया गया है। संस्कृत श्लोकों में रचित लघु ग्रन्थ लघुपाराशरी में फलित ज्योतिष संबंधी सिद्धांतों का वर्णन है और ये 42 सूत्रों के माध्यम से वर्णित है। एक-एक सूत्र अपने आप में अमूल्य है। इसे 'जातकचन्द्रिका'  "उडुदाय प्रदीप" भी कहा जाता है। यह विंशोत्तरी दशा पद्धति का महत्वपूर्ण ग्रन्थ है तथा वृहद् पाराशर होराशास्त्र पर आधारित है। फलित ज्योतिष विद्या के महासागर रुपी ज्ञान को अर्जित करने के लिए पराशर सिद्धांतों पर आधारित लघुपाराशरी एक बहुमूल्य साधन सिद्ध हो सकती है। इस पुस्तक का कोई एक लेखक नहीं है। यह पुस्तक पाराशरी सिद्धांत को मानने वाले महर्षि पाराशर,  उनके अनुयायियों, प्रकांड विद्वानों द्वारा सामूहिक रूप से सम्पादित है।

फलित ज्योतिष पर आधारित इस ग्रंथ के आधार में कई बडे ग्रंथों की रचना की गई। फलित ज्योतिष पर रचे इस ग्रन्थ को अधिकतम ज्योतिषि भविष्यवाणी करने के लिए इसका प्रयोग करते है। इस ग्रंथ में मूलतः पराशर सिद्धांतों के 42 सूत्रों में नौ ग्रहों की विविध भावों में उपस्थिति, ग्रहों की मित्रता, शत्रुता अथवा सम होना, ग्रहों की पूर्ण व आंशिक दृष्टियों का उल्लेखभाव, कारकों, दशाओं, राजयोग, मृत्युरयोग सहित भावानुसारी फलादेश आदि पर वर्णन किया गया है।

3. चमत्कार चिंतामणि

भट्ट नारायण  द्वारा लिखे चमत्कार चिंतामणि की 108 श्लोकों में ज्योतिष विद्या के कई महत्वपूर्ण सूत्र है। कुछ ज्योतिषियों के अनुसार चमत्कार चिंतामणि में चार लाख ज्योतिष शास्त्रों के महासागर से एकत्र किया हुआ ज्ञान है। इसके अनुसार 9 ग्रह और 12 घर हैं। इसकी 108 च्लोकाओं के एक एक सूत्र में विशेष ग्रह के हर घर पर प्रभाव को लिखा गया है। उदाहरण के लिए प्रथम भाव फल में  पहला घर सूर्य का है। उन्होंने मेष से मीन तक 12 लक्षणों का कोई संदर्भ नहीं लिखा है जो कि अलग-अलग जन्मों में एक ही घर में बढ़ सकता है। इस पुस्तक में यूरोपियन और इंडियन सिद्धांतों का निचोड़ है। 
इसमें 9 ग्रहों में से प्रत्येक का विस्तार से वर्णन है जैसे उनकी विशेषताओं, रंग, जाति, हर ग्रह का मालिक, तत्व, देवता, रत्न आदि। इसमें  कुंडली के बारह भावो में से प्रत्येक का हर राशि में ग्रहों पर प्रभाव,अन्य ग्रहों के साथ पहलुओं और संयोजनों का भी वर्णन है। यह अन्य ग्रहों जैसे बुध, शनि आदि किस विशेष घर में स्थित है उसका भी वर्णन करता है। 

4. बृहज्जातकम 

बृहज्जातकम या 'वृहत जातक' वराहमिहिर द्वारा रचित पाँच प्रमुख ग्रन्थों में से एक है। उनके द्वारा रचित अन्य 5 ग्रन्थ ये हैं- पंचसिद्धान्तिका, बृहत संहिता, लघुजातक और योगयात्रा। यह ग्रन्थ हिन्दू ज्योतिष के 5 प्रमुख ग्रन्थों में से एक है, अन्य चार ग्रन्थ ये हैं- कल्याणवर्मा कृत सारावली, वेंकटेश कृत सर्वार्थ चिन्तामणि, वैद्यनाथ कृत जातक पारिजात, मन्त्रेश्वर कृत फलदीपिका।

5. भृगु संहिता

ऋषि भृगु के द्वारा लिखी गई भृगु संहिता ज्योतिष के क्षेत्र में माने जाने वाले बहुमूल्य ग्रन्थों में से एक है। भृगु संहिता एक ऐसा ग्रंथ जिसमें कई जन्मों के राज व ज्योतिष संबंधी सभी जानकारी उपलब्ध है। भृगु संहिता एक लोकप्रिय आर्ष ग्रंथ माना गया है। भृगु संहिता लगभग 5 हजार साल पुराना एक धार्मिक ग्रंथ है जिसे ऋषि भृगु ने लिखा था। भृगु संहिता में कुंडली के लग्न के अनुसार, व्यक्ति का भाग्योदय बताया जा सकता है। इस शास्त्र से प्रत्येक व्यक्ति की तीन जन्मों की जन्मपत्री बनाई जा सकती है और प्रत्येक जन्म का विवरण भी जाना जा सकता है।

6. वृहत्संहिता 

वाराहमिहिर ने वृहत्संहिता में ज्योतिष के आधार पर नक्षत्रों के अनुसार वर्षा के विषय में विस्तृत विवरण दिया है। वृहत्संहिता में प्रकृति की भाषा को समझने और उससे भविष्य का पता लगाने के बारे में लिखा गया है। प्राचीन समय से ही हिन्दुओं ने प्रकृति की आवाज को सुनने और समझने का प्रयत्न किया है। आज वैज्ञानिक इस बात से सहमत हैं कि पशु-पक्षी मौसम में होने वाले बदलाव को पहले से भांपकर अपने आचरण में परिवर्तन करते हैं। वृहत्संहिता में पशु-पक्षी इत्यादि के आचरण मंन होने वाले परिवर्तन का अवलोकन करके भविष्यवाणी करने के तरीके बताये गए हैं। इसमें कृषि विज्ञान की जानकारी भी है। कृषि के लिए जमीन की तैयारी, एक पेड़ की कलम को दूसरे में लगाने, सही मौसम में वृक्षों की सिंचाई करने, वृक्षों के आरोपण की दूरी, वृक्षों में उत्पन्न बीमारियों की चिकित्सा, जमीन में गड्ढ़ा कर बोने के तरीके आदि का भी उल्लेख किया है। ‘वृहत्‌ संहिता‘ में अस्त्र-शस्त्रों को बनाने के लिए अत्यंत उच्च कोटि के इस्पात के निर्माण की विधि का वर्णन किया है। बृहत्संहिता में वास्तुविद्या, भवन-निर्माण-कला, वायुमंडल की प्रकृति, वृक्षायुर्वेद आदि विषय सम्मिलित हैं।

7. वृहज्जातक

वृहज्जातक में वाराहमिहिर ने ज्योतिष विज्ञान विशेषतः यात्रा मुहूर्त, विवाह मुहूर्त, जन्म-कुंडली आदि का वर्णन किया है। वृहज्जातक में वाराहमिहिर ने केमद्रुम योग जो ज्योतिष में चंद्रमा से निर्मित एक महत्वपूर्ण योग है, इसके बारे में बताया है। यदि चंद्रमा से द्वितीय और द्वादश दोनों स्थानों में कोई ग्रह नही हो तो केमद्रुम नामक योग बनता है या चंद्र किसी ग्रह से युति में न हो या चंद्र को कोई शुभ ग्रह न देखता हो तो कुण्डली में केमद्रुम योग बनता है। केमद्रुम योग के संदर्भ में छाया ग्रह राहु केतु की गणना नहीं की जाती है। 

8. पंचसिद्धान्तिका

पंचसिद्धान्तिका में खगोल शास्त्र का वर्णन किया गया है। इसमें वाराहमिहिर के समय प्रचलित पाँच खगोलीय सिद्धांतों का वर्णन है। इस ग्रन्थ में ग्रह और नक्षत्रों का गहन अध्ययन किया गया है। इन सिद्धांतों द्वारा ग्रहों और नक्षत्रों के समय और स्थिति की जानकारी प्राप्त की जा सकती है। इसमें त्रिकोणमिति के महत्वपूर्ण सूत्र दिए हुए हैं।

9. समास संहिता 

समास संहिता में समालिंगन, वैदिक मनुष्यों तथा तकनीकी ज्ञान रखने वालो के बारे में बताया गया है। समास का तात्पर्य है ‘संक्षिप्तीकरण’। दो या दो से अधिक शब्दों से मिलकर बने हुए एक नवीन एवं सार्थक शब्द को समास कहते हैं। जैसे - ‘रसोई के लिए घर’ इसे हम ‘रसोईघर’ भी कह सकते हैं। संस्कृत एवं अन्य भारतीय भाषाओं में समास का बहुतायत में प्रयोग होता है। जर्मन आदि भाषाओं में भी समास का बहुत अधिक प्रयोग होता है।

10. होराशास्त्र

भारतीय ज्योतिष में होरा चक्र का बहुत महत्व है। विद्वान लोग होरा शास्त्र को शुभ और अशुभ कर्म फल की प्राप्ति के लिये उपयोग करते हैं। फलित ज्योतिष का दूसरा नाम है - होराशास्त्र। ज्योतिष के फलित पक्ष पर जहाँ विकसित नियम स्थापित किए जाते हैं, वह होराशास्त्र है। उदाहरणार्थ: राशि, होरा, द्रेष्काण, नवमांश, चलित, द्वादशभाव, षोडश वर्ग, ग्रहों के दिग्बल, काल-बल, चेष्टा-बल, ग्रहों के धातु, द्रव्य, कारकत्व, योगायोग, अष्टवर्ग, दृष्टिबल, आयु योग, विवाह योग, नाम संयोग, अनिष्ट योग, स्त्रियों के जन्मफल, उनकी मृत्यु नष्टगर्भ का लक्षण प्रश्न आदि होराशास्त्र के अंतर्गत आते हैं। वैसे होरा का अर्थ है- एक घंटा।
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