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उत्तरकालामृत ग्रन्थ की इन विशेषताओं के बारे में नहीं जानते होंगे आप

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उत्तरकालामृत ग्रन्थ की विशेषता 

दक्षिण भारत के प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य कालीदास (कवि कालीदास से भिन्न) ने तेरहवीं शताब्दी में प्रसिद्ध ग्रंथ उत्तरकालामृत ग्रन्थ की रचना की थी। इस ग्रन्थ के आधार पर अनेकानेक शुभ-अशुभ लग्नों का शोधन किया जाता है। उत्तरकालामृत ग्रन्थ नामक इस ग्रंथ में विवाह, मुंडन, गृह प्रवेश, कर्ण छेदन, यज्ञोपवीत सहित गर्भाधान, पुंसवन आदि अनेक संस्कारों के लिए शुभाशुभ मुहूर्तों की गणना और व्याख्या दी गई है।

उत्तरकालामृत के नाम ही इसकी विशेषता है। इस ग्रन्थ को पढ़ने वाले को अमृत की प्राप्ति निश्चित है। इस ग्रन्थ को निश्चय ही काल मंथन कर अमृत पर्पटी का एक जरिया बताया गया है। कालिदास ने अपने ग्रंथ ‘पूर्व कालामृत’ और ‘उत्तर कालामृत’ में नौ नक्षत्र और बारह राशियां मिलाकर एक सौ आठ की संख्या बनाई। इस ग्रन्थ में विवाह, विरुद्ध-सम्बन्ध आदि पर विवरण प्राप्त है। उत्तरकालामृत ग्रन्थ एक मात्र जातक ग्रन्थ है जिसमें मुहूर्त और कर्मकांड को भी सम्मिलित किया गया है। इस ग्रन्थ में काल का समग्र, समन्वित और संतुलित वर्णन है।

“उत्तर कालामृत” की विशेषता:  लघु पाराशरी सिद्धान्तों का अपवाद 

वर्तमान में ज्योतिष दशा गणना में सर्वाधिक प्रयुक्ति होने वाली विधि पाराशर पद्धति है। महर्षि पाराशर के फलित ज्यो तिष संबंधी सिद्धांत लघु पाराशरी में मिलते हैं। इनमें कुल 42 सूत्र हैं जिन्हें हम लघु पाराशरी सिद्धान्तों के नाम से भी जानते है। इसे 'जातकचन्द्रिका' भी कहते हैं। यह विंशोत्तरी दशा पद्धति का महत्वपूर्ण ग्रन्थ है तथा वृहद् पाराशर होराशास्त्र पर आधारित है। लघुपाराशरी में 42 श्लोक हैं जो पाँच अध्यायों में विभक्त हैं -संज्ञाध्याय, योगाध्याय, आयुर्दायाध्याय, फलाध्याय और शुभाशुभग्रहकथनाध्याय। 

पराशर संहिता के नियम अपवाद होने के कारण कई स्थानों पर काम नहीं करते। इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए दक्षिण भारत के एक विख्यात ज्योतिष कालिदास ने “उत्तर कालामृत” की रचना की। कालिदास ने पाराशरी सिद्धांतों के अपवाद नियमों का गहन विवेचन कर उत्तर कालामृत प्रस्तुत किया। कालीदास विरचित ग्रंथ का प्रयोग विद्वान और सजग ज्योतिषी ऐसे नियम की जानकारी है जो पराशर संहिता के पूरे खिलाफ हैं।

उत्तरकालामृत ग्रन्थ के कुछ विचित्र नियम

राजयोग या विपरीत राजयोग : जातक राज्याधिकारी या साधारण व्यक्ति 

राजयोग वे ग्रह स्थितियां हैं जिनसे व्यक्ति विपुल धन संपदा, पद, गौरव, सुख और ऐश्वर्य पाता है। विपरीत राजयोग में व्यक्ति को प्राप्तियां तो होती हैं लेकिन वह उनका आनंद नहीं ले पाता। जिस किसी व्यक्ति की कुंडली में ये ज्योतिषीय योग बनता है तो व्यक्ति राज्याधिकारी बनता है। जब कुंडली में  2, 3, 5, 6, 8, 9 तथा 11, 12 में से किसी स्थान में बृहस्पति की स्थिति हो और शुक्र 8वें स्थान में हो तो ऐसी ग्रह स्थिति में जन्म लेने वाला जातक राज्याधिकारी ही बनता है। कभी-कभी हम लोग किसी साधारण परिवार में जन्मे बालक के राजसी लक्षण देखते है जो इसी योग के कारण बनते हैं। जब भी मनुष्य कोई कोशिश करता है या किसी चीज़ की इच्छा करता है तो उसके प्रयत्न विभिन्न योगों के अनुसार ही विकसित होते हैं। 

दशाफल का विचित्र नियम शुक्र में शनि, शनि में शुक्र :

ज्योतिष के अनुसार, शुक्र व शनि दोनों मित्र हैं। यदि दो मित्र ग्रह उत्तम स्थिति में हो तो अपनी-अपनी दशा व अंतर्दशा में बहुत अच्छा फल देते हैं। मगर उत्तरकालामृत ग्रन्थ में इसके विपरीत नियम है। जब शुक्र में शनि और शनि में शुक्र की दशा का योग बनता है तो कुबेर भिक्षु और भिक्षु भी कुबेर बन जाता है। अगर शुक्र तथा शनि दोनों उच्च, स्वक्षेत्री, वर्गोत्तम आदि में योगकारक होकर बलवान हो जाए और एक दूसरे की दशा तथा अंतर्दशा बन जाए तो ये स्थिति पैदा हो जाती है। ऐसे समय में कोई कुबेर समान राजा भी भिक्षा मांगकर जीवन निर्वाह करने वाला बन जाता है। इसके विपरीत यदि शुक्र और शनि में से कोई एक बलवान तथा दूसरा बलहीन हो जाए तो बलवान ग्रह का योग फल देता है। 
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