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क्या अशुद्ध उच्चारण से मंत्र हानिकारक प्रभाव देते हैं?

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मंत्र, शब्दों का संचय है जो इष्ट को प्राप्त करने और अनिष्ट बाधाओं को दूर करने का मार्ग है। मंत्र शब्द में ‘मन’ का तात्पर्य मन और मनन से है और ‘त्र’ का तात्पर्य शक्ति और रक्षा से है । मंत्र जप से व्यक्ति को पूरे ब्रह्मांड की एकरूपता का ज्ञान प्राप्त होता है। मन का लय हो जाता है और मन भी शांत हो जाता है। मंत्रजप के अनेक लाभ हैं- आध्यात्मिक प्रगति, शत्रु का विनाश, अलौकिक शक्ति पाना, पाप नष्ट होना और वाणी की शुद्धि आदि। ये सभी लाभ तभी प्राप्त हो सकते हैं जब व्यक्ति इनका उच्चारण ठीक प्रकार से करे।

उच्चारण  क्या होता है ?

जिस प्रकार से कोई शब्द बोला जाता है; या कोई भाषा बोली जाती है; या कोई व्यक्ति किसी शब्द को बोलता है; उसे उसका उच्चारण कहते हैं। भाषाविज्ञान में उच्चारण के शास्त्रीय अध्ययन को ध्वनिविज्ञान की संज्ञा दी जाती है। भाषा के उच्चारण की ओर तभी ध्यान जाता है जब उसमें कोई असाधारणता होती है
उच्चारण के अंतर्गत प्रधान रूप से तीन बातें आती हैं :

ध्वनियों, विशेषकर स्वरों में ह्रस्व दीर्घ का भेद,
बलात्मक स्वराघात,
गीतात्मक स्वराघात।

इन्हीं के अंतर से किसी व्यक्ति या वर्ग के उच्चारण में अंतर आ जाता है। कभी-कभी ध्वनियों के उच्चारण स्थान में भी कुछ भेद पाए जाते हैं। किसी भाषा की समस्त ध्वनियों को सही ढंग से उच्चारित करने हेतु वर्तनी की एकरुपता स्थापित की जाती है। जिस भाषा की वर्तनी में अपनी भाषा के साथ अन्य भाषाओं की ध्वनियों को ग्रहण करने की जितनी अधिक शक्ति होगी, उस भाषा की वर्तनी उतनी ही समर्थ होगी। अतः वर्तनी का सीधा सम्बन्ध भाषागत ध्वनियोँ के उच्चारण से है।

शुद्ध वर्तनी लिखने के प्रमुख नियम निम्न प्रकार हैँ–

हिन्दी मेँ विभक्ति चिह्न सर्वनामोँ के अलावा शेष सभी शब्दों से अलग लिखे जाते हैँ .उच्चारण दोष अथवा शब्द रचना और संधि के नियमों की जानकारी की अपर्याप्तता के कारण सामान्यतः वर्तनी अशुद्धि हो जाती है। वर्तनी की अशुद्धियोँ का प्रमुख कारण हैँ– उच्चारण दोष
उच्चारण दोष: कई क्षेत्रों व भाषाओं में, स–श, व–ब, न–ण आदि वर्णों में अर्थभेद नहीं किया जाता तथा इनके स्थान पर एक ही वर्ण स, ब या न बोला जाता है जबकि हिन्दी मेँ इन वर्णों की अलग–अलग अर्थ–भेदक ध्वनियाँ हैँ। अतः उच्चारण दोष के कारण इनके लेखन मेँ अशुद्धि हो जाती है।

मंत्र उच्चारण के प्रभाव :

शिक्षा के विस्तार के साथ उच्चारण की अशुद्धियाँ काफ़ी बढ गयी हैं खासकर मंत्र उच्चारण में। ज़माने के तेज़ी से बढ़ने के साथ उच्चारण की शुद्धता पर उतना ध्यान और समय नहीं दिया गया जितना आवश्यक है। मंत्र उच्चारण में गलत उच्चारण का सिलसिला बढ़ता जा रहा है। शुद्ध उच्चारण के अभाव में मंत्र का प्रभाव अधूरा रह जाता है। मंत्र का मौखिक रूप आदमी के स्वभाव, सभ्यपन और चरित्र का तात्कालिक दर्पण दर्शाता है। इसलिए मौखिक रूप में मंत्र उच्चारण का महत्त्व कहीं अधिक है। 

जब कभी किसी धार्मिक स्थल में प्रवेश करते हैं तो वहां का वातावरण आपको मानसिक शांति प्रदान करता है। इसका सबसे बड़ा कारण है उस विशेष धार्मिक स्थल में उच्चारित किए जाने वाले मंत्र, धार्मिक उपदेश एवं श्लोक। सभी धार्मिक स्थलों का अंदरूनी वातावरण आपके तन एवं मन को एक खुशनुमा एहसास प्रदान करता है। मंदिर में जो मूर्ति होती है इनका प्रभाव का आधार मंत्र ही है। बिना मंत्र सिद्धि के यंत्र या मूर्ति अपना प्रभाव नहीं दे सकती। मंदिर में उच्चारित होने वाले मंत्रों की वजह से मंदिर में रखी मूर्तियों का प्रभाव होता है।  

मानव अपने जीवन में आ रहे दुःख ओर संकटो से मुक्ति पाने के लिये किसी विशेष मन्त्र का जाप करता है। स्वयं मनुष्य भी मानता है कि मंत्रों का उच्चारण उन्हें तन एवं मन की शांति प्रदान करता है। यह मंत्र मानसिक स्फूर्ति प्रदान करते हैं तथा अनेक दुविधाओं से बचाते हैं। दवाओं की तुलना में मंत्रों का उच्चारण रोगों से लड़ने की अधिक शक्ति प्रदान करता है।  मंत्र, उपदेश या श्लोक. सभी कुछ ऐसे शब्दों का प्रयोग करके बने हैं जो चमत्कारी हैं तथा मनुष्य को विभिन्न कठिनाइयों से लड़ने की ताकत प्रदान करते हैं। हिन्दू धर्म में ‘ॐ’, सिख धर्म में ‘वाहेगुरु’, इस्लाम में ‘अल्लाह’ तथा ईसाई धर्म में ‘गॉड’, यह कुछ ऐसे शब्द हैं जो मंत्र एवं उपदेशों के साथ जुड़कर व्यक्ति पर एक चमत्कारी असर छोड़ जाते हैं। स्वयं विज्ञान ने यह माना है कि ‘ॐ’ शब्द में ब्रह्मांड जितनी चमत्कारी ताकते हैं। 

कहते हैं कि जब तक मंत्रों का सही उच्चारण ना हो, चाहे उसे जितनी मर्जी पढ़ लिया जाए, वह निष्फल ही रहता है। आम धारणा के अनुसार देवता भक्त का भाव देखते है वो शुद्धि अशुद्धि पर ध्यान नही देते हैं। ऐसा कहना एक हद तक ठीक है। भगवान केवल भावों को ग्रहण करने वाले हैं और जब कोई भक्त भगवान को निष्काम भाव से, बिना किसी स्वार्थ के याद करता है तब भगवान भक्त की क्रिया, मन्त्र की शुद्धि-अशुद्धि के ऊपर ध्यान नही देते हैं बल्कि वो तो केवल भक्त का भाव देखते हैं। मन्त्र का बिल्कुल शुद्ध उच्चारण करना एक आम व्यक्ति के लिये संभव नहीं है क्योंकि हिन्दू धर्म में सभी मंत्र इसी संस्कृत भाषा में लिखे गए हैं।
मंत्र विद्या अत्यंत प्रभावशाली है, किंतु किसी भी मंत्र की सफलता के लिए मंत्र की सिद्धि अनिवार्य है। जब कोई व्यक्ति किसी विशेष मनोरथ को पूर्ण करने के लिये किसी मन्त्र का जाप या स्तोत्र का पाठ करता है तब सम्बन्धित देवता उस व्यक्ति की छोटी से छोटी क्रिया ओर अशुद्ध उच्चारण पर ध्यान देते हैं। व्यक्ति जैसा जाप या पाठ करता है वैसा ही उसको फल प्राप्त होता है। उच्चारण के संबंध में कुछ सावधानियाँ बरतने की ज़रूरत है। 

अशुद्ध मंत्र उच्चारण के हानिकर प्रभाव : 

उच्चारण से हमारे मंत्र की शोभा बढ़ती है। इससे मन का पूरा ध्यान लग पाता है। गलत उच्चारण से ध्यान भटक सकता है। 
ज़रूरत-से-ज़्यादा ज़ोर देकर शब्दों का उच्चारण करने से प्रभाव खत्म होता है। 
उच्चारण के संबंध में बिलकुल भी लापरवाही नहीं करनी चाहिए। 
मंत्र उच्चारण से धीरे-धीरे चिंताओं एवं रोगों से मुक्ति पाई जा सकती है। गलत उच्चारण से इसका प्रभाव उल्टा पड सकता है। 
सही उच्चारण के साथ मंत्र ऐसी ध्वनि उत्पन्न करते हैं, जो तरंगों का रूप धारण कर उस व्यक्ति के ईर्द-गिर्द ही घूमती रहती हैं तथा वातावरण को स्वच्छंद बनाती हैं। गलत उच्चारण वातावरण को दूषित कर सकते हैं। 
मंत्र आपकी वाणी, आपकी काया, आपके विचार को प्रभावपूर्ण बनाते हैं। इसलिए सही मंत्र उच्चारण ही सर्वशक्तिदायक बनाता है। 
मंत्र उच्चारण को मंत्र योग’ का नाम भी दिया गया है। इस योग को करते हुए, अर्थात मंत्र का उच्चारण करते समय तरंगें हमारे शारीरिक अंगों में स्फूर्ति लाती हैं। आप खुद में ‘पूर्णता’ महसूस करते हैं। इसके विपरीत गलत उच्चारण से व्यक्ति खुद को हानि पंहुचा सकता है 
शास्त्रों के अनुसार सौ बार गलत उच्चारण के साथ भी पढ़ा गया मंत्र फल प्राप्ति नहीं देगा, लेकिन एक बार ही सही उच्चारण के साथ जपा गया मंत्र जरूर अच्छा फल प्रदान करता है। 
मंत्रो का सही उच्चारण तभी किया जा सकता हैं जब आप इन मंत्रों को पढ़ते समय ‘ध्वनि’ पर ध्यान दें। मंत्रों का सही फल उसे पढ़ते हुए उत्पन्न हुई ध्वनि पर निर्भर करता है। प्रत्येक ध्वनि एक उर्जा है, उस ध्वनि में हलके से भेद से ही उसका प्रभाव उल्टा पड़ सकता है। उदाहरण के लिए, महामृत्युंजय जाप स्वास्थ्यवर्धक होता है परंतु उच्चारण की छोटी सी त्रुटि से वह यम (मृत्युदेव) का आह्वान बन जाता है। इसलिए मंत्रों का प्रयोग गुरु सानिध्य में ही करना चाहिए।
ध्वनि से प्रकाश और प्रकाश से पांच तत्त्व उत्पन्न हुए। सभी की अपनी एक ध्वनि है जिनसे इस संसार की प्रत्येक वस्तु का निर्माण हुआ। ध्वनि को बदलने से मानव का पूरा स्वरूप बदल जाता है। एक स्वस्थ शरीर और रोगी शरीर में भी ध्वनि का ही फर्क है। मंत्र उच्चारण भी इसी का हिस्सा है। मंत्र उच्चारण द्वारा शरीर की ध्वनि को सूक्ष्म कर दिया जाए, तो रोगी स्वस्थ हो सकता है और डकैत योगी बन सकता है। उसी प्रकार अशुद्ध उच्चारण और निम्न ध्वनियों के प्रयोग से घर, वातावरण तथा सृष्टि में असंतुलन उत्पन्न हो सकता है। 
मंत्रों के उच्चारण से पूर्व, शरीर का संतुलन में होना तथा नाड़ियों का शुद्धीकरण आवश्यक है, तभी साधक मंत्र की शक्ति का संचालन कर सकेगा। 
मंत्रोच्चारण के लिए शिक्षा-दीक्षा लेनी चाहिए क्योंकि अशुद्ध उच्चारण से लाभ की बजाय नुक्सान होगा। मंत्र जाप पूर्ण संख्या में, एक ही आसन पर, एक ही समय में सम संख्या में करना चाहिए।
जब भी मंत्र का जाप करें उसे पूर्ण संख्या में करना जरूरी है।
मंत्र एक ही आसन पर एक ही समय में सम संख्या में करना चाहिए।
मंत्र जाप पूर्ण होने के बाद दशांश हवन अवश्य करना चाहिए तभी पूर्ण फल मिलता है।
उच्चारण सुधारने के तरीके। जिन लोगों को उच्चारण की समस्या होती है, दरअसल उनमें से कइयों को अपनी इस कमज़ोरी का एहसास नहीं होता। अगर आपको उच्चारण में परेशानी है तो किसी ज्योतिष या पंडित की सलाह अवशय लें। वो आपको कहां-कहां सुधार करने की ज़रूरत है वो सब बताएगा
कई भाषाओं में ऐसे शब्दकोश होते हैं जिनमें शब्दों की वर्तनी, सही उच्चारण और मतलब दिया होता है। अगर आपकी भाषा में ऐसा शब्दकोश है, तो आप उसमें ऐसे शब्द देख सकते हैं जिनसे आप वाकिफ नहीं हैं। शब्दकोश में जो चिन्ह इस्तेमाल किए गए हैं, उनका क्या मतलब है।  इससे आपको यह भी मालूम पड़ेगा कि एक शब्द के स्वरों और व्यंजनों का किस स्वर के साथ उच्चारण किया जाता है। कई बार, अलग-अलग संदर्भ में एक ही शब्द का कई तरीकों से उच्चारण किया जा सकता है। आप शब्दकोश कई बार बोल-बोलकर पढ़ने का अभ्यास कीजिए।
उच्चारण में सुधार लाने का अन्य तरीका है किसी पंडित या ज्ञानी के सामने मंत्र पढ़कर सुनाना, खासकर उसके सामने जो सही उच्चारण जानता हो।  

मंत्र उच्चारण का कर्म सिद्धांत नियम :
शास्त्रों में लिखा है। 
मूर्खो वदति विष्णाय, ज्ञानी वदति विष्णवे ।
द्वयोरेव संमं पुण्यं, भावग्राही जनार्दनः ।।

अर्थात -
मूर्ख व्यक्ति "" ऊँ विष्णाय नमः"" बोलेगा।
ज्ञानी व्यक्ति "" ऊँ विष्णवे नमः"" बोलेगा।
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