language
Hindi

भारत के महानतम ज्योतिषी

view1718 views
ज्योतिष अंधविश्वास नहीं है, सदियों का विश्वास है, प्रामाणिक विज्ञान और सशक्त शास्त्र है। भारत की महानतम भूमि ने ऐसे दिव्य रत्न प्रदान किए हैं जिनकी मनीषा और विलक्षणता ने समस्त संसार को चौंका दिया है। आज भी उनकी बुद्धिमत्ता और ज्ञान रहस्य का विषय हैं। ज्योतिष भारत की समृद्ध और यशस्वी परंपरा है। समूची ज्योतिष विद्या पर प्रश्न चिन्ह भारतीय संस्कृति पर प्रश्नचिन्ह है। नारद, आर्यभट्ट, वराहमिहिर, पराशर, गर्गाचार्य, लोमश ऋषि, निबंकाचार्य, पृथुयश, कल्याण वर्मा, लल्लाचार्य, भास्कराचार्य (प्रथम), ब्रह्मगुप्त, श्रीधराचार्य, मुंजाल यह सिर्फ नाम नहीं है ज्योतिष शास्त्र में इनका अपना गौरवमयी यशस्वी योगदान रहा है। 

आर्यभट (प्रथम)

आर्यभट प्राचीन भारत के एक महान ज्योतिषविद् और गणितज्ञ थे। इन्होंने आर्यभटीय ग्रंथ की रचना की जिसमें ज्योतिषशास्त्र के अनेक सिद्धांतों का प्रतिपादन है। इसी ग्रंथ में इन्होंने अपना जन्मस्थान कुसुमपुर और जन्मकाल शक संवत् 398 लिखा है। उनका जन्म 476 ईस्वी में बिहार में हुआ था। उन्होंने नालंदा विश्वविद्यालय से पढाई की। उनके मुख्य कार्यो में से एक “आर्यभटीय” 499 ईसवी मंा लिखा गया था। इसमें बहुत सारे विषयों जैसे खगोल विज्ञान, गोलीय त्रिकोणमिति, अंकगणित, बीजगणित और सरल त्रिकोणमिति का वर्णन है। उन्होंने गणित और खगोलविज्ञान के अपने सारे अविष्कारों को श्लोकों के रूप में लिखा। इस किताब का अनुवाद लैटिन में 13वीं शताब्दी में किया गया।

आर्यभट के समय से ही ज्योतिष का क्रमबद्ध इतिहास मिलता है। इनका गणित ज्योतिष से संबद्ध आर्यभटीय-तंत्र प्राप्त है, यह उपलब्ध ज्योतिष ग्रंथों में सबसे प्राचीन है। इसमें दशगीतिका, गणित, कालक्रिया तथा गोल नाम वाले चार पाद हैं। इसमें सूर्य और तारों के स्थिर होने तथा पृथ्वी के घूमने के कारण दिन और रात होने का वर्णन है। इनके निवास स्थान के विषय में विद्वानों में मतैक्य नहीं है, कुछ लोग दक्षिण देश के 'कुसुमपुर' को इनका स्थान बताते हैं तथा कुछ लोग 'अश्मकपुर बताते हैं। इनका समय 397 शकाब्द बताया गया है। गणित ज्योतिष के विषय में आर्यभट के सिद्धांत अत्यंत मान्य हैं। इन्होंने सूर्य और चंद्र ग्रहण के वैज्ञानिक कारणों की व्याख्या की है और वर्ग, वर्गमूल, घन, घनमूल आदि गणितीय विधियों का महत्वपूर्ण विवेचन किया है  

वराहमिहिर 

भगवान सूर्य के कृपापात्र वराहमिहिर ही पहले आचार्य हैं जिन्होंने ज्योतिष शास्त्र को सि‍द्धांत, संहिता तथा होरा में स्पष्ट रूप से व्याख्यायित किया है। वराहमिहिर ईसा की पाँचवीं-छठी शताब्दी के भारतीय गणितज्ञ एवं खगोलज्ञ थे। वाराहमिहिर ने ही अपने पंचसिद्धान्तिका में सबसे पहले बताया कि अयनांश का मान 50.32 सेकेण्ड के बराबर है। वराहमिहिर विक्रमाद्वित्य के नौ रत्नों में से ये एक रत्न थें। उसी समय के ज्योतिषी आर्यभट्ट के साथ मिलकर भी इन्होंने ज्योतिष के फलित नियमों का प्रतिपादन किया। आर्यभट्ट इनके गुरु थे और ज्योतिष की अनेक नियम इन्होंने आर्यभट्ट से सीखें। 

कापित्थक (उज्जैन) में उनके द्वारा विकसित गणितीय विज्ञान का गुरुकुल सात सौ वर्षों तक अद्वितीय रहा। वरःमिहिर बचपन से ही अत्यन्त मेधावी और तेजस्वी थे। अपने पिता आदित्यदास से परम्परागत गणित एवं ज्योतिष सीखकर इन क्षेत्रों में व्यापक शोध कार्य किया। समय मापक घट यन्त्र, इन्द्रप्रस्थ में लौहस्तम्भ के निर्माण और ईरान के शहंशाह नौशेरवाँ के आमन्त्रण पर जुन्दीशापुर नामक स्थान पर वेधशाला की स्थापना - उनके कार्यों की एक झलक देते हैं। वरःमिहिर का मुख्य उद्देश्य गणित एवं विज्ञान को जनहित से जोड़ना था। वस्तुतः ऋग्वेद काल से ही भारत की यह परम्परा रही है। वरःमिहिर ने पूर्णतः इसका परिपालन किया है। वराहमिहिर के प्रयासों ने ही ज्योतिष को एक विज्ञान का रुप दिया। ज्योतिष के क्षेत्र में इनके योगदान की सराहना जितनी की जाएं, वह कम है। ज्योतिष की प्राचीन प्रसिद्ध नगरी उज्जैनी में रहकर इन्होंने अनेक ज्योतिष ग्रन्थों की रचना की। इनके पिता भी अपने समय के प्रसिद्ध ज्योतिषी थे। ज्योतिष की प्रथम शिक्षा इन्होनें अपने पिता से ही प्राप्त की। 

इन्होंने तीनों स्कंधों के निरूपण के लिए तीनों स्कंधों से संबद्ध अलग-अलग ग्रंथों की रचना की है। ये उज्जैन के रहने वाले थे इसीलिए ये अवन्तिकाचार्य भी कहलाते हैं। ये भारतीय ज्योतिष शास्त्र के मार्तण्ड कहे जाते हैं। वराहमिहिर ने चार प्रकार के माहों का उल्लेख किया।

सौर माह, चन्द्र माह, वर्षीय माह और पाक्षिक माह थे ।

इनकी कृतियों की सूची

पंचसिद्धान्तिका
बृहज्जातकम्
लघुजातक
बृहत्संहिता
टिकनिकयात्रा
बृहद्यात्रा या महायात्रा
योगयात्रा या स्वल्पयात्रा
वृहत् विवाहपटल
लघु विवाहपटल
कुतूहलमंजरी
दैवज्ञवल्लभ
लग्नवाराहि

कल्याण वर्मा

कल्याण वर्मा 10वीं सदी के प्रसिद्ध लेखक थे। वह वियागढ़ा नामक एक जगह के राजा थे। ये जगह मध्य प्रदेश में मानी जाती थी। इनके काम के छंदों से यह स्पष्ट होता है कि इन्होने अपने सामने परशुरा, वरहमिहिरा और यवन आदि के कामों का अध्ययन किया है। इन्होंने सिद्धांतों को विस्तृत तौर पर उल्लेख किया है। सारावली ऋषि कल्याण वर्मा द्वारा लिखित एक प्राचीन और प्रामाणिक वैदिक ज्योतिष शास्त्र है। सारावली होराशास्त्र का प्रमुख ग्रंथ है। सारावली को पढ़ने से वैदिक ज्योतिष की अवधारणाओं और वास्तविक जीवन में उनके आवेदन को समझने में बहुत मदद मिलती है। ऋषि कल्याण वर्मा ने सरवाली में वैदिक ज्योतिष राशि के दो ग्रहों के संघ के परिणाम समझाएं हैं। ज्योतिष के गंभीर विद्यार्थियों के लिए सारावली का अध्ययन आवश्यक है। इनका समय शकाब्द 500 के लगभग है। सारावली फलादेश अत्यंत प्रामाणिक माना जाता है। इसमें 42 अध्याय हैं। कहा जाता है कि इन्हें सरस्वती का वरदान प्राप्त था। भट्टोत्पल ने बृहज्जातक की टीका में सारावली के कई श्लोक उद्धृत किए हैं। 

पृथुयश

पृथुयश आचार्य वराहमिहिर के पुत्र हैं। इनके द्वारा विरचित 'षट्पंचाशिका' फलित ज्योतिष का प्रसिद्ध ग्रंथ है। इसमें सात अध्याय हैं। 'सतपंचस्यिका, प्रतायास पृथुयश द्वारा पृथुयश प्रसिद्ध ग्रंथ है जो पूना कॉलेज संग्रह में रखी गई है।

ऋषि अत्रि

ज्योतिष के इतिहास से जुडे 18 ऋषियों में से एक थे ऋषि अत्रि। एक मान्यता के अनुसार, ऋषि अत्रि का जन्म ब्रह्मा जी के द्वारा हुआ था। भगवान श्री कृ्ष्ण ऋषि अत्रि के वंशज माने जाते है। कई पीढि‍यों के बाद ऋषि अत्रि के कुल में ही भगवान श्री कृ्ष्ण का जन्म हुआ था। यह भी कहा जाता है कि ब्रह्मा जी के सात मानस पुत्र उत्पन्न हुए थे, उसमें ऋषि पुलस्त्य, ऋषि पुलह, ऋषि वशिष्ठ, ऋषि कौशिक, ऋषि मारिचि, ऋषि क्रतु, ऋषि नारद है। इन महाऋषियों के ज्योतिष के प्राद्रुभाव में महत्वपूर्ण योगदान रहा है।

ब्रह्मा जी के यही सात पुत्र आकाश में सप्तर्षि के रुप में विद्यमान है। इस संबन्ध में एक पौराणिक कथा प्रचलित है। तारामंडल का प्रयोग दिन, तिथि, कुण्डली निर्माण, त्यौहार और मुहूर्त आदि कार्यों के लिए किया जाता है व इन सभी का उपयोग भारत की कृ्षि के क्षेत्र में प्राचीन काल से होता रहा है।
ज्योतिष के इतिहास के ऋषि अत्रि का नाम जुड़ा होने के साथ-साथ, देवी अनुसूया और रायायण से भी ऋषि अत्रि जुडे हुए हैं। आयुर्वेद और प्राचीन चिकित्सा क्षेत्र सदैव ऋषि का आभारी रहेगा। इन्हें आयुर्वेद में अनेक योगों का निर्माण किया। पुराणों के अनुसार, ऋषि अत्रि का जन्म ब्रह्मा जी के नेत्रों से हुआ माना जाता है। ऋषि अत्रि ने ज्योतिष में चिकित्सा ज्योतिष पर कार्य किया, इनके द्वारा लिखे गये। सिद्दान्त आज चिकित्सा ज्योतिष में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है।

लल्लाचार्य

लल्लाचार्य भारत के ज्योतिषविद् और गणितज्ञ थे। वे शाम्ब के पौत्र तथा भट्टत्रिविक्रम के पुत्र थे। उन्होने 'शिष्यधीवृद्धिदतन्त्रम्'= शिष्य की बुद्धि बढ़ाने वाला तन्त्र नामक एक ग्रन्थ की रचना की। इस ग्रन्थ की रचना का कारण बताते हुए लल्लाचार्य ने स्वयं को आर्यभट का शिष्य बताया है। इसी ग्रन्थ में उन्होंने 'अमरगति' (परपिचुअल मोशन) की सबसे पहली लिखित व्याख्या की है। इसमें 22 अध्याय हैं। प्रथम 13  अध्याय 'गणिताध्याय' के अन्तर्गत आते हैं तथा शेष 9 अध्याय मिलाकर 'गोलाध्याय' कहलाते हैं। लल्लाचार्य की यह एकमात्र खगोलशास्त्रीय कृति है जो जीवित बची है।

गोलाध्याय के सातवें अध्याय ('मिथ्याज्ञान' नामक बीसवाँ अध्याय) में लल्ल ने पुराणों में कही गईं अनेकों ज्योतिषीय विचारों की आलोचना की है (जैसे धरती के चपटी होने का विचार, सूर्य का चन्द्रमा के अधिक निकट होना, राहु के कारण ग्रहण का होना आदि)। लल्लाचार्य ज्योतिष के सिद्धांत स्कंध से संबद्ध 'शिष्यधीवृद्धितंत्र' ग्रंथ अत्यंत प्रसिद्ध है। इनके समय के विषय में मतभेद हैं, किंतु कुछ आचार्यों का कहना है कि ये 500 शकाब्द के आसपास विद्यमान थे। इन्हें दाक्षिणात्य बताया गया है। इन्होंने रत्नकोष (संहिता ज्योतिष) तथा जातकसार (होरास्कंध) नामक ग्रंथों का भी प्रणयन किया। लल्लाचार्य गणित, जातक और संहिता इन तीनों स्कंधों में पूर्ण प्रवीण थे। शिष्यधीवृद्धितंत्र में प्रधान रूप से गणिताध्याय में अनेक अधिकार (प्रकरण) हैं। भास्कराचार्यजी इनके ज्ञान से विशेष प्रभावित थे।  

भास्कराचार्य

भास्कराचार्य या भाष्कर द्वितीय (1114 – 1185) प्राचीन भारत के एक प्रसिद्ध गणितज्ञ एवं ज्योतिषी थे। इनके द्वारा रचित मुख्य ग्रन्थ सिद्धान्त शिरोमणि है जिसमें लीलावती, बीजगणित, ग्रहगणित तथा गोलाध्याय नामक चार भाग हैं। ये चार भाग क्रमशः अंकगणित, बीजगणित, ग्रहों की गति से सम्बन्धित गणित तथा गोले से सम्बन्धित हैं। आधुनिक युग में धरती की गुरुत्वाकर्षण शक्ति (पदार्थों को अपनी ओर खींचने की शक्ति) की खोज का श्रेय न्यूटन को दिया जाता है। किंतु बहुत कम लोग जानते हैं कि गुरुत्वाकर्षण का रहस्य न्यूटन से भी कई सदियों पहले भास्कराचार्य ने उजागर कर दिया था। भास्कराचार्य ने अपने ‘सिद्धांतशिरोमणि’ ग्रंथ में पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के बारे में लिखा है कि ‘पृथ्वी आकाशीय पदार्थों को विशिष्ट शक्ति से अपनी ओर खींचती है। इस कारण आकाशीय पिण्ड पृथ्वी पर गिरते हैं’। उन्होंने करणकौतूहल नामक एक दूसरे ग्रन्थ की भी रचना की थी। ये अपने समय के सुप्रसिद्ध गणितज्ञ थे। कथित रूप से यह उज्जैन की वेधशाला के अध्यक्ष भी थे। उन्हें मध्यकालीन भारत का सर्वश्रेष्ठ गणितज्ञ माना जाता है।

इनका जन्म 1114 ई0 में, विज्जडविड नामक गाँव में हुआ था जो सहयाद्रि पहाड़ियों में स्थित हैं। उन्होंने गणित का ज्ञान अपने सन्त पिता से प्राप्त किया। बाद में ब्रह्मगुप्त की पुस्तकों से ऐसी प्रेरणा मिली कि सारा जीवन उन्होंने गणित के लिए समर्पित कर दिया। सन् 1150 ई० में इन्होंने सिद्धान्त शिरोमणि नामक पुस्तक, संस्कृत श्लोकों में, चार भागों में लिखी है, जो क्रम से इस प्रकार है:

पाटीगणिताध्याय या लीलावती,
बीजगणिताध्याय,
ग्रहगणिताध्याय, तथा
गोलाध्याय

ब्रह्मगुप्त 

ब्रह्मगुप्त प्रसिद्ध भारतीय गणितज्ञ थे। प्रसिद्ध ज्योतिषी भास्कराचार्य ने ब्रह्मगुप्त को ‘गणचक्र-चूड़ामणि’ का शीर्षक प्रदान किया और साथ ही उनके मूलांकों को ही अपने ‘सिद्धांत शिरोमणि’ का आधार बनाया। वे तत्कालीन गुर्जर प्रदेश (भीनमाल) के अन्तर्गत आने वाले प्रख्यात शहर उज्जैन (वर्तमान मध्य प्रदेश) की अन्तरिक्ष प्रयोगशाला के प्रमुख थे और इस दौरान उन्होने दो विशेष ग्रन्थ लिखे: ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त 628 में और खण्डखाद्यक या खण्डखाद्यपद्धति 665 ई. में लिखा। ये अच्छे वेधकर्ता थे और इन्होंने वेधों के अनुकूल भगणों की कल्पना की है। प्रसिद्ध गणितज्ञ ज्योतिषी, भास्कराचार्य, ने अपने सिद्धांत को आधार माना है और बहुत स्थानों पर इनकी विद्वत्ता की प्रशंसा की है। मध्यकालीन यात्री अलबरूनी ने भी ब्रह्मगुप्त का उल्लेख किया है। महान गणितज्ञ आचार्य ब्रह्मगुप्त ब्राह्मसि‍द्धांत का विस्तार करने वाले हैं। ये विष्णु के पुत्र हैं। प्रसिद्ध भास्कराचार्य ने इन्हें “गणकचक्र-चूड़ामणि” कहा है। 

'ब्रह्मस्फुट सिद्धांत' सबसे पहला ग्रन्थ माना जाता है जिसमें शून्य का एक विभिन्न अंक के रूप में उल्लेख किया गया है। यही नहीं, बल्कि इस ग्रन्थ में ऋणात्मक अंकों और शून्य पर गणित करने के सभी नियमों का वर्णन भी किया गया है। ब्रह्मगुप्त शून्य से भाग करने का नियम सही नहीं दे पाये: 0/0 = 0। उन्होंने शक संवत् 550 (685 विक्रमी) में 'ब्रह्मस्फुटिक सिद्धान्त' की रचना की। इन्होंने स्थान-स्थान पर लिखा है कि आर्यभट्ट, श्रीषेण, विष्णुचन्द्र आदि की गणना से ग्रहों का स्पष्ट स्थान शुद्ध नहीं आता है, इसलिए वे त्याज्य हैं और 'ब्रह्मस्फुटिक सिद्धान्त' में दृग्गणितैक्य होता है, इसलिए यही मानना चाहिए। इससे सिद्ध होता है कि ब्रह्मगुप्त ने 'ब्रह्मस्फुटिक सिद्धान्त' की रचना ग्रहों का प्रत्यक्ष वेद करके की थी और वे इस बात की आवश्यकता समझते थे कि जब कभी गणना और वेध में अन्तर पड़ने लगे तो वेध के द्वारा गणना शुद्ध कर लेनी चाहिए। ये पहले आचार्य थे जिन्होंने गणित ज्योतिष की रचना विशेष क्रम से की और ज्योतिष और गणित के विषयों को अलग-अलग अध्यायों में बाँटा।

श्रीधराचार्य

श्रीधराचार्य जन्म 750 ई. में हुआ था। ये प्राचीन भारत के एक महान गणितज्ञ थे। इन्होंने शून्य की व्याख्या की तथा द्विघात समीकरण को हल करने सम्बन्धी सूत्र का प्रतिपादन किया। उनके बारे में हमारी जानकारी बहुत ही अल्प है। उनके समय और स्थान के बारे में निश्चित रूप से कुछ भी नहीं कहा जा सकता है। किन्तु ऐसा अनुमान है कि उनका जीवनकाल 870 ई. से 930 ई. के बीच था। वे वर्तमान हुगली जिले में उत्पन्न हुए थे। उनके पिताजी का नाम बलदेवाचार्य औरा माताजी का नाम अच्चोका था। बीजगणित के ज्योतिर्विदों में श्रीधराचार्य का स्थान अन्यतम है। इनके त्रिशतिका, बीजगणित, जातक पद्धति तथा रत्नमाला आदि प्रसिद्ध ग्रंथ हैं। परवर्ती भास्कराचार्य आदि इनके सिद्धांतों से बहुत उपकृत हैं। 

इन्होंने 750ई. के लगभग दो प्रसिद्ध पुस्तकें त्रिशतिका (इसे 'पाटीगणितसार' भी कहते हैं), पाटीगणित और गणितसार, लिखीं। इन्होंने बीजगणित के अनेक महत्वपूर्ण आविष्कार किए। वर्गात्मक समीकरण को पूर्ण वर्ग बनाकर हल करने का इनके द्वारा आविष्कृत नियम आज भी 'श्रीधर नियम' अथवा 'हिंदू नियम' के नाम से प्रचलित है। 'पाटीगणित, पाटीगणित सार और त्रिशतिका उनकी उपलब्ध रचनाएँ हैं जो मूलतः अंकगणित और क्षेत्र-व्यवहार से संबंधित हैं।

मुंजाल

इनका रचनाकाल शक संवत् 854 है। मुंजाल का ज्योतिष-जगत् में महान आदर है। ये भारद्वाजगोत्रीय थे। मध्याधिकार, स्पष्टाधिकार आदि आठ प्रकरणों में विभक्त 'लघुमानस' करण ग्रंथ के रचयिता मुंजाल का ज्योतिष-जगत् में महान आदर है। इनका उपलब्ध ग्रंथ भी लघुमानसकरण है। अयनांशनिरूपण में इनका विशिष्ट योगदान रहा है। प्रतिपाद्य विषय गणित होने पर भी इस ग्रंथ की शैली बड़ी रोचक तथा सुगम है। इन्होंने अयनगति 1 कला मानी है। अयनगति के प्रसंग में भास्कराचार्य ने इनका नाम लिया है। मुनीश्वर ने मरीचि में अयनगति विषयक इनके कुछ श्लोक उद्धृत किए हैं, जो लघुमानस के नहीं हैं। इससे पता चलता है कि मुंजाल का एक और मानस नामक ग्रंथ था, जो उपलब्ध नहीं है।
आपको यह आलेख कैसा लगा, अपनी टिप्पणी हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं
टिप्पणी