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रत्न कैसे कार्य करते हैं?

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कुछ पत्थर या पदार्थों में कुछ विशेष गुण, चरित्र एवं विशेषताएँ होने के कारण उन्हें रत्न कहा जाता है जैसे-हीरा, माणिक्य, वैदूर्य, नीलम, पुखराज, पन्ना आदि को लोग रत्न के नाम से पुकारते हैं। वास्तव में ये सारे पत्थर ही हैं, लेकिन बेशक़ीमती पत्थर इसलिए इन्हें प्रिसियस स्टोन (बहुमूल्य पत्थर) भी कहते हैं। 'रत्न' का विशेष अर्थ श्रेष्ठत्व भी है।

रत्नों का प्रयोग 

ज्योतिष में किए जाने वाले उपायों में से एक बहुत शक्तिशाली उपाय है। रत्न कोई भी हो अपने आपमें प्रभावशाली होता है। मनुष्य अनादिकाल से ही रत्नों की तरफ आकर्षित रहा है, वर्तमान में भी है तथा भविष्य में भी रहेगा। प्राचीन काल से ही राजा महाराजा तथा धनवान लोग रत्नों का प्रयोग करते आ रहे हैं तथा आज के युग में भी बहुत से धनवान तथा प्रसिद्ध लोगों की उंगलियों में तरह-तरह के रत्न देखने को मिलते हैं। रत्न आकर्षक खनिज का एक टुकड़ा होता है। रत्न पूर्णतया विभिन्न रसायनों के एकत्रित होने से प्राकृतिक रुप से अन्य खनिज लवणों की तरह अरबों-खरबों वर्षों में बनते हैं। रत्नों का बनना रसायनिक क्रिया है। यह पूर्णतया वैज्ञानिक है ।

रत्नो की कार्यप्रणाली अर्थात रत्न कैसे कार्य करते हैं  यह विषय अद्रश्य चेतना का विषय हैं जिसको रसायन, भौतिक, जैविक आदि शास्त्रों की तरह प्रयोगशाला में जांचा-परखा नहीं जा सकता। रत्न का हमारे शरीर के साथ कुछ ऐसा सम्बन्ध है जो कि अदृश्य है। रत्नों के प्रभाव को न तो देखा का सकता है और न ही परखा जा सकता है।  इसका प्रभाव केवल महसूस किया जा सकता है। रत्नों की कार्य पद्धति ठीक रंग कार्य पद्धति की तरह है। रत्न  विज्ञान को समझने के लिए सबसे सरल रंग कार्य प्रणाली को समझाना है।  

रंग कार्य पद्धति को सूर्य से समझा जा सकता है। जब सूर्य की किरणों को जब प्रिज्म से निकलने दिया जाता है तो वह किरण सात रंगों में दिखाई देती है। सात रंगों का यह क्रम है – बैंगनी, नीला, आसमानी, हरा, पीला, नारंगी और लाल। हमारे ग्रहों के भी सात रंग हैं, यह सिद्ध किया जा चुका है। सूर्य का रंग नारंगी है। चंद्रमा का श्वेत, मंगल का लाल, बुद्ध का हरा, गुरु का पीला, शुक्र का श्वेत और शनि का काला रंगा है। रत्न कार्य प्रणाली के अनुसार जिस रंग के कारण शरीर के अवयवों में न्यूनता आती है, उस रंग के रत्न को धारण करने से रत्न सूर्य की रश्मियों से जरूरी रंग को शोषित करके शरीर में समाहित कर देता है। जब रत्नों की अवशोषित तरंगें हमारे तन और मन पर सूक्ष्मतर तरंगों का प्रभाव छोड़ती है तो हमारे स्वभाव, गुण तथा कर्मानुसार अनेक समस्याओं से मुक्ति मिलती है। रत्न का अनुकूल अथवा प्रतिकूल प्रभाव उनके उचित चयन पर किया जाता है।

रत्नों की कार्यप्रणाली को कुंडली की वैज्ञानिक कार्यप्रणाली के द्वारा समझा जा सकता है। एक कुंडली के अध्यन्न के लिए 12 राशियों, 12 भावो , नवग्रहों आदि का अध्ययन किया जाता है।

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, कुल 12 ज्योतिष राशियाँ होती हैं - एरीस - मेष, टोरस – वृषभ, जैमिनी - मिथुन, कैंसर - कर्क, लिओ - सिंह, वर्गो- कन्या, लिब्रा - तुला, स्कोर्पियो - वृश्चिक, सैजिटेरियस – धनु, कैप्रिकॉर्न - मकर, एक्वेरियस - कुम्भ और पाइसेज- मीन। 

12 राशियों में से कोई एक राशि हर समय आकाश मंडल में उदित रहती है। एक राशि के आकाश में उदित रहने का सामान्य समय 2 घंटे होता है तथा इसके पश्चात उस राशि के बाद आने वाली राशि आकाश में उदय हो जाती है और फिर अगले दो घंटे तक वह राशि आकाश में उदित रहती है। इस प्रकार से 12 की 12 राशियां एक दिन अर्थात 24 घंटे में अपने-अपने क्रम से उदय होती रहती हैं तथा यह क्रम निरंतर चलता रहता है। किसी भी व्यक्ति विशेष के जन्म के समय जो राशि आकाश में उदित होती है, वह उस व्यक्ति का लग्न कहलाती है तथा इस राशि को उस व्यक्ति की कुंडली में पहले भाव में स्थान दिया जाता है। इसके बाद की राशियों को कुंडली में क्रमश: 2,3,4,5,6,7,8,9,10,11 और 12वां  स्थान दिया जाता है। 

इसके पश्चात नवग्रहों -मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, और शनि, सूर्य, चंद्रमा, राहू और केतु में से प्रत्येक ग्रह की किसी राशि विशेष में उपस्थिति के अनुसार उसे कुंडली के उस भाव में स्थान दिया जाता है जहां पर वह राशि स्थित है। शास्त्रों में 12 भावों के स्वरूप हैं और भावों के नाम के अनुसार ही इनका काम होता है। पहला भाव तन, दूसरा धन, तीसरा सहोदर, चतुर्थ मातृ, पंचम पुत्र, छठा अरि, सप्तम रिपु, आठवाँ आयु, नवम धर्म, दशम कर्म, एकादश आय और द्वादश व्यय भाव कहलाता है। इसके पश्चात नवग्रहों का इन भावों में स्थान सुनिश्चित किया जाता है। समस्त नवग्रहों को उनकी तत्कालीन राशि स्थिति के अनुसार कुंडली के विभिन्न भावों में स्थान दिया जाएगा तथा कुंडली का निर्माण पूरा हो जाएगा।

प्रत्येक कुंडली में एक या एक से अधिक ग्रह सकारात्मक स्वभाव के होने के बावजूद भी कुंडली के किसी भाव विशेष में या किसी राशि विशेष में अपनी उपस्थिति के कारण अथवा एक या एक से अधिक नकारात्मक ग्रहों के बुरे प्रभाव के कारण बलहीन हो जाते हैं तथा कुंडली धारक को पूर्ण रूप से अपनी सकारात्मकता का लाभ देने में सक्षम नही रह जाते। यही वह परिस्थिति है जहां पर ऐसे ग्रहों के रत्नों का प्रयोग इन ग्रहों को अतिरिक्त बल प्रदान करने का उत्तम उपाय है। 

कुंडली -12 भावों, 12 राशियों और 9 ग्रहों का अध्यनन और रत्नों की कार्य प्रणाली 

कुंडली में दिखाए जाने वाले बारह भाव वास्तव में कुंडली धारक के शरीर में विद्यमान बारह उर्जा केंद्र होते हैं जो भिन्न-भिन्न ग्रहों की उर्जा का पंजीकरण, भंडारण तथा प्रसारण करते हैं। किसी व्यक्ति के जन्म के समय इनमें से कुछ उर्जा केंद्र उस समय की ग्रहों तथा नक्षत्रों की स्थिति के अनुसार सकारात्मक अथवा शुभ फलदायी उर्जा का पंजीकरण करते हैं, कुछ भाव नकारात्मक अथवा अशुभ फलदायी उर्जा का पंजीकरण करते हैं, कुछ भाव सकारात्मक तथा नकारात्मक दोनों प्रकार की उर्जा का पंजीकरण करते हैं तथा कुछ भाव किसी भी प्रकार की उर्जा का पंजीकरण नहीं करते। अंतिम प्रकार के भावों को कुंडली में खाली दिखाया जाता है तथा इनमें कोई भी ग्रह स्थित नहीं होता। इस प्रकार प्रत्येक ग्रह अपनी किसी राशि विशेष में स्थिति, किसी भाव विशेष में स्थिति तथा कुछ अन्य महत्वपूर्ण तथ्यों के आधार पर विभिन्न उर्जा केंद्रों अथवा भावों में अपने बल तथा स्वभाव का पंजीकरण करवाते हैं। किसी व्यक्ति के जन्म के समय प्रत्येक ग्रह का उसके शरीर के इन ऊर्जा केंद्रों में अपने बल तथा स्वभाव का यह पंजीकरण ही उस व्यक्ति के लिए जीवन भर इन ग्रहों के बल तथा स्वभाव को निर्धारित करता है।

नवग्रहों के रत्नों में से प्रत्येक रत्न अपने से संबंधित ग्रह की ऊर्जा को सोखने और फिर उसे धारक के शरीर के किसी विशेष उर्जा केंद्र में स्थानांतरित  करने का कार्य वैज्ञानिक रूप से करता है। इस प्रकार जिस भी ग्रह विशेष का रत्न कोई व्यक्ति धारण करेगा, उसी ग्रह विशेष की अतिरिक्त उर्जा उस रत्न के माध्यम से उस व्यक्ति के शरीर में स्थानांतरित  होनी शुरू हो जाएगी तथा वह ग्रह विशेष उस व्यक्ति को प्रदान करने वाले अच्छे या बुरे फलों में वृद्धि कर देगा।

रत्न , ग्रह और उनका  प्रभाव - 

1 माणिक्य – सूर्य – शरीर की ऊष्णता को नियंत्रित करता है, मानसिक संतुलन देता है
2 मोती – चन्द्रमा – भावनाओं को नियंत्रित करता है
3 मूंगा – मंगल – शरीर की ऊष्णता को बढ़ाता है, पाचन क्षमता बढ़ाता है
4 पन्ना – बुध – बौद्धिक क्षमताओं की वृद्धि करता है, संतुलन सिखाता है
5 पुखराज – बृहस्पति – आध्यात्मिक उन्नति देता है, ज्ञान का बेहतर प्रयोग करना सिखाता है
6 हीरा – शुक्र – प्रेम और सौन्दर्य के प्रति सकारात्मकता देता है, समृद्धि देता है
7 नीलम – शनि – न्याय, तकनीकी ज्ञान, तार्किकता बढ़ाता है
8 गोमेद – राहु – शरीर के हार्मोन्स को संतुलित करता है
9 वैदूर्य – केतु – शरीर में नकारात्मक ऊर्जा के प्रवाह को रोकता है
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