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रत्न धारण में कौन सी सावधानियां रखें

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हर मनुष्य की जन्मपत्री में ग्रहों की कमजोर और बलवान दशा के अनुसार ही मनुष्य के भाग्य में परिवर्तन आता रहता है। अशुभ ग्रहों को शुभ बनाना या शुभ ग्रहों को और अधिक शुभ बनाने की मनुष्य की सर्वदा चेष्टा रही है जिसके लिए वो अनेक उपाय करता है जैसे मंत्र जाप, दान, औषधि स्नान, रत्न धारण, धातु एवं यंत्र धारण, देव दर्शन आदि। रत्न धारण एक महत्वपूर्ण एवं असरदार उपाय है।

कुछ सावधानियां अनिवार्य 

कहते है कि रत्न स्वयं सिद्ध प्रकृति का अनमोल उपहार हैं। पृथ्वी पर मनुष्य ने अपनी हर समस्या का समाधान ढूंढ लिया है, समाधान चाहे वैज्ञानिक हो या तांत्रिक या ज्योतिष या कोई और परन्तु उसे हमेशा सावधानीपूर्ण ही करना चाहिए। ज्योतिष विद्या के अनुसार, रत्न धारण करने से मनुष्य की समस्याओं का समाधान हो जाता है। रत्न धारण करना कहने को तो अंगूठी पहनाने के समान आसान है परन्तु रत्न धारण में कुछ सावधानियां अनिवार्य है।   

नौ रत्न ही ज्यादा पहने जाते हैं। सूर्य के लिए माणिक, चन्द्र के लिए मोती, मंगल के लिए मूंगा, बुध के लिए पन्ना, गुरु के लिए पुखराज, शुक्र के लिए हीरा, शनि के लिए नीलम, राहु के लिए गोमेद, केतु के लिए लहसुनिया। रत्न खरीदना आसान कार्य है परन्तु रत्न हमेशा किसी विश्वसनीय एवं रत्नों के जानकार व्यक्ति से ही ख़रीदने चाहिए। अनजान व्यक्ति आपको नकली या अशुद्ध रत्न दे सकता है। असली और नकली रत्नों में काफी समानता होती है इसलिए सामान्य व्यक्ति के लिए अंतर कर पाना मुश्किल है।  

रत्न की सत्यता और मूल्य का वास्तविक अनुमान उसके भाव से भी पता लगाया जा सकता है। हमेशा रत्न के भाव को जानकर ही उसको ख़रीदें। रत्न को खरीदने से पहले उसकी शुद्ता की जांच कर लें। 
रत्नों को धारण करने से पहले उससे सम्बंधित ग्रहों की जन्मपत्रिका में स्थिति व अन्य ग्रहों से संबंध की जांच अवश्य करवा लें। ग्रह के विरोधी रत्नों को कभी भी नहीं पहनना चाहिए जैसे कि माणिक्य के साथ नीलम, हीरा, मोती के साथ मूंगा, नीलम, हीरा, पन्ना, गोमेद, लहसुनिया, पुखराज के साथ हीरा, पन्ना, गोमेद, मूंगा आदि। 

कौन सा रत्न कब पहना जाए इसके लिए कुंडली का सूक्ष्म निरीक्षण जरूरी होता है। लग्न कुंडली, नवमांश, ग्रहों का बलाबल, दशा-महादशाएँ आदि सभी का अध्ययन करने के बाद ही रत्न पहनें। 
अपने लिए उपयुक्त रत्न जान लेने के पश्चात आपके लिए यह जान लेना आवश्यक है कि इन रत्नों को धारण करने की सही विधि क्या है। सबसे पहले यह जान लें कि प्रत्येक रत्न को धारण करने के लिए सबसे बढ़िया दिन कौन सा है। प्रत्येक रत्न को धारण करने के लिए उत्तम दिन इस प्रकार हैं:


1. माणिक्य:         रविवार
2. मोती:              सोमवार
3. पीला पुखराज:    गुरुवार
4. सफ़ेद पुखराज:   शुक्रवार
5. लाल मूंगा:        मंगलवार
6. पन्ना:             बुधवार
7. नीलम:            शनिवार
8. गोमेद:            शनिवार
9. लहसुनिया:       शनिवार


किसी भी रत्न को अंगूठी में जड़वाते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए। जिस अंगूठी में आप रत्न को जड़वाना चाहते हैं, उसका नीचे का तला खुला होना चाहिए तथा आपका रत्न उस खुले तले में से हल्का सा नीचे की तरफ निकला होना चाहिए जिससे कि वह आपकी उंगली को सही प्रकार से छू सके तथा अपने से संबंधित ग्रह की ऊर्जा आपकी उंगली के इस सम्पर्क के माध्यम से आपके शरीर में स्थानांतरित कर सकें। 
अपने रत्न से जड़ित अंगूठी लेने पहले यह जांच लें कि आपका रत्न इस अंगूठी मं  से हल्का सा नीचे की तरफ़ निकला हुआ हो। अंगूठी बन जाने के बाद सबसे पहले इसे अपने हाथ की इस रत्न के लिए निर्धारित उंगली में पहन कर देखें ताकि अंगूठी ढीली अथवा तंग होने की स्थिति में आप इसे उसी समय ठीक करवा सकें।
इसके पश्चात रत्न का शुद्धिकरण तथा प्राण प्रतिष्ठा की जाती है तथा इस चरण में विशेष विधियों के द्वारा रत्न को प्रत्येक प्रकार की नकारात्मक ऊर्जा से मुक्त किया जाता है तथा तत्पश्चात विशेष विधियों से रत्न की प्राण प्रतिष्ठा की जाती है। शुद्धिकरण तथा प्राण प्रतिष्ठा के विधिवत पूरा हो जाने से रत्न की सकारात्मक प्रभाव देने की क्षमता बढ़ जाती है तथा रत्न प्रत्येक प्रकार की संभव अशुद्धियों तथा नकारात्मक उर्जा से मुक्त हो जाता है।
शुद्धिकरण तथा प्राण प्रतिष्ठा हो जाने पर अंगूठी को प्राप्त कर लेने के पश्चात् इसे धारण करने से 24 से 48 घंटे पहले किसी कटोरी में गंगाजल अथवा कच्ची लस्सी में डुबो कर रख दें। कच्चे दूध में आधा हिस्सा पानी मिलाने से आप कच्ची लस्सी बना सकते हैं किन्तु ध्यान रहे कि दूध कच्चा होना चाहिए अर्थात इस दूध को उबाला न गया हो। 
गंगाजल या कच्चे दूध वाली इस कटोरी को अपने घर के किसी स्वच्छ स्थान पर रखें। घर में पूजा के लिए बनाया गया स्थान इसे रखने के लिए उत्तम स्थान है। किन्तु घर में पूजा का स्थान न होने की स्थिति में आप इसे अपने अतिथि कक्ष अथवा रसोई घर में किसी उंचे तथा स्वच्छ स्थान पर रख सकते हैं। यहां पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि इस कटोरी को अपने घर के किसी भी शयन कक्ष में बिल्कुल न रखें।
इसके पश्चात इस रत्न को धारण करने के दिन प्रातः उठ कर स्नान करने के बाद इसे धारण करना चाहिए। वैसे तो प्रात: काल सूर्योदय से पूर्व का समय रत्न धारण करने के लिए श्रेष्ठ माना जाता है किन्तु आप इसे अपने नियमित स्नान करने के समय पर भी धारण कर सकते हैं। स्नान करने के बाद रत्न वाली कटोरी को अपने सामने रख कर किसी स्वच्छ स्थान पर बैठ जाएं तथा रत्न से संबंधित ग्रह के मूल मंत्र, बीज मंत्र अथवा वेद मंत्र का 108 बार जाप करें। इसके बाद अंगूठी को कटोरी में से निकालें तथा इसे अपनी उंगली में धारण कर लें। 
अनिष्ट ग्रहों के प्रभाव को कम करने के लिए या जिस ग्रह का प्रभाव कम पड़ रहा हो उसमें वृद्धि करने के लिए उस ग्रह के रत्न को धारण करना चाहिए। एक साथ कौन से रत्न पहनना शुभ और लाभकारी होता है।

माणिक्य के साथ नीलम, गोमेद, लहसुनिया वर्जित है।
मोती के साथ हीरा, पन्ना, नीलम, गोमेद, लहसुनिया वर्जित है।
मूंगा के साथ पन्ना, हीरा, गोमेद, लहसुनिया वर्जित है।
पन्ना के साथ मूंगा, मोती वर्जित है।
पुखराज के साथ हीरा, नीलम, गोमेद वर्जित है।
हीरे के साथ माणिक्य, मोती, मूंगा, पुखराज वर्जित है
नीलम के साथ माणिक्य, मोती, पुखराज वर्जित है।
गोमेद के साथ माणिक्य, मूंगा, पुखराज वर्जित है।
लहसुनिया के साथ माणिक्य, मूंगा, पुखराज, मोती वर्जित है।
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