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क्रूर और पापी ग्रहों का शुभ फल कब मिलता है, जानिए

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ब्रह्माण्ड में मौज़ूद सभी ग्रहों में से नौ ग्रह सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि एवं राहु व केतु हमारे ऊपर गहरा प्रभाव डालते हैं। छाया ग्रह होने के बावज़ूद राहु-केतु का असर जीवन पर काफी बड़ा होता है। इन सभी नौ ग्रहों में से गुरु, शुक्र तथा बलवान चंद्र पूर्ण रूप से शुभ कहलाते हैं। जबकि सूर्य व मंगल क्रूर ग्रह कहलाते हैं एवं शनि सहित राहु व केतु को नैसर्गिक पापी ग्रह कहा जाता है। इसके साथ ही बलहीन चंद्र व पापी ग्रह के प्रभाव में आकर बुध भी पापी ग्रह की तरह व्यवहार करने लगते हैं। यानि इस प्रकार कुल नौ ग्रहों में तीन नैसर्गिक पापी और दो ग्रह चंद्र एवं बुध अपनी स्थिति के आधार पर पापी बन जाते हैं तथा सूर्य व मंगल वैसे तो क्रूर ग्रह हैं किंतु कुछ शास्त्रज्ञों ने इन्हें भी क्रूर व पापी संज्ञक माना है।

यहां हमारा प्रश्न है कि आखिर किन स्थितियों में पापी ग्रह शुभ फलदायक हो जाते हैं? 

पाराशरी सिद्धांत के अनुसार, यदि नैसर्गिक पापी ग्रह केंद्र के स्वामी हों तो वे शुभ फलदायक होंगे। इसके अलावे यदि नैसर्गिक पापी ग्रह छठे, आठवें अथवा बारहवें भाव के स्वामी होकर पुनः उन्हीं स्थानों पर बैठ जाएं तथा उन्हें कोई दूसरा पापी ग्रह देखे तो वे शुभ दायक हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में वे विशेष रूप से विपरीत राजयोगकारक बन कर जातक को शुभता का उत्कट फल प्रदान करते हैं। 

आइए एक उदाहरण से इसे समझें: 

तुला लग्न की एक कुण्डली को ख्याल में लें। लग्न में शुक्र व राहु, तीसरे भाव में सूर्य व बुध, छठे भाव में गुरु, सातवें में केतु, चौथे भाव में मंगल के साथ शनि एवं नौवें में चंद्र बैठा हो ऐसी स्थिति में चतुर्थेश-पंचमेश शनि केंद्र व त्रिकोण का स्वामी होने की वजह से शुभ कारक तथा राजयोगकारक बन गया जबकि मंगल क्रूर होकर भी सप्तम केंद्र का स्वामी होने के कारण शुभत्व प्राप्त कर लेता है। यानि स्थिति बिल्कुल स्पष्ट है कि नैसर्गिक पापी अथवा स्थितिवश पापी ग्रह स्थितिविशेष में शुभ ग्रह का व्यवहार करते हैं। 
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