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कुंडली में निःसंतान योग: एक केस स्टडी

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अक्सर लोग इस तरह के सवाल पूछते हैं कि उनकी किस्मत में संतान के योग हैं या वे बिल्कुल निःसंतान रह जाएंगे? आधुनिक भौतिकवादी युग में, जहां शादियां भी काफी देर से हो रही हैं, वहां इस तरह की समस्या होनी लाज़िमी है। किंतु फिर भी किसी व्यक्ति का पूर्णतः निःसंतान रह जाना बहुत बड़ी चिंता का कारण बन जाता है।

एस्ट्रोलॉजी में इस टॉपिक पर बहुत विस्तृत चर्चा मौज़ूद है। इसलिए यहां इस आलेख में हम आमजन के हितार्थ उन बिंदुओं पर खास तौर से प्रकाश डालेंगे, जिनके कारण कोई भी व्यक्ति निःसंतान योग से पीड़ित होता है। इसके अतिरिक्त हम उन तरीकों को अगले आलेखों में सामने लेकर आएंगे, जिन्हें अपनाकर कोई निःसंतान व्यक्ति अपने जीवन में स्वयं के संतान का सुख उठा सके।

मीन लग्न की एक कुण्डली आपके सामने उल्लिखित करते हैं, जिसमें पूर्ण रूप से निःसंतान योग मौज़ूद है:

मीन लग्न की कुण्डली में शनि तृतीय भाव में, केतु पंचम भाव में, बुध छठे भाव में, सूर्य व शुक्र सातवें भाव में, चन्द्रमा आठवें भाव में, गुरु नवम भाव में, राहु व मंगल ग्यारहवें भाव में विराजित हैं।

ध्यान से देखेंगे तो पंचम भाव जो संतानोत्पत्ति के लिए पूर्णतया उत्तरदायी है, उसमें स्वयं केतु बैठा है, शनि की तृतीय पूर्ण दृष्टि पंचम भाव पर पड़ रही है, इसके साथ ग्यारहवें भाव में बैठे हुए राहु व मंगल की सप्तम पूर्ण दृष्टियां भी शनि प्रभाव युक्त होकर पंचम भाव पर पड़ रही हैं।

यानि ऐसी स्थिति में पंचम भाव तो बुरी तरह प्रताड़ित हुआ ही स्वयं पंचमेश चन्द्र अष्टम भाव में पहुंचा हुआ है, जिस कारण किसी भी रूप में संतान उत्पन्न होने की संभावना खत्म हो जाती है।     

 इसके साथ ही संतान कारक गुरु की पोजीशन भी देख लीजिए। यहां पर संतान कारक गुरु नवम भाव में तो बैठा है किंतु वह स्वयं केतु की पूर्ण पंचम दृष्टि व शनि की पूर्ण सप्तम दृष्टि से पीड़ित हो रहा है। ऐसे में भाव, भावेश व कारक तीनों ही पूर्णतया पीड़ित हैं, जिससे संतान उत्पन्न होने की संभावना बिल्कुल भी नहीं हैं।

उपरोक्त उदाहरण में वर्णित जातक की उम्र फिलहाल 42 वर्ष है और न तो उसकी शादी हो सकी और जब शादी ही नहीं हुई तो फिर संतान की संभावना कैसे हो सकती है! इसी कुण्डली में पूर्णरूप से विवाह प्रतिबंधक योग भी मौज़ूद है, जिस कारण जातक अपनी शादी के लिए खुद ही इंकार करता रहा है।
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