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क्या कहते हैं कुण्डली के सभी बारह भाव?

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आमजन के लिए ज्योतिष शास्त्र के सामान्य नियमों को सामने लाया जाना क्यों ज़रूरी है? क्यों एक सामान्य जातक, जो कि एस्ट्रोलॉजी के विषय में एबीसीडी भी नहीं जानता, उसे भी कुछ बेहद महत्वपूर्ण अध्यायों को समझना चाहिए? इसका लाभ ये है कि यदि वह किसी विशेषज्ञ के पास अपनी समस्या से रिलेटेड समाधान के लिए गया तो कम से कम उसे उस ज्योतिर्विद की बात की गहराई तो समझ में आ ही जाएगी..............इसका लाभ ये होगा कि उसे अपनी समस्या का सटीक समाधान मिलने के साथ उसके धोखा खाने की संभावना न्यूनतम हो जाएगी।

तो आइए देखते हैं कि कुण्डली यानि जन्मांगम के सभी बारह भाव क्या अर्थ रखते हैं...................

प्रथम अथवा तनु भाव: कुण्डली का प्रथम भाव पूरे शरीर का प्रतिनिधि करता है।

शरीर की स्थिति कैसी, आरोग्य अथवा रोगी प्रकृति, सामान्य व्यवहार व धन की पोजीशन कैसी होगी, आयु आदि-आदि जैसे महत्वपूर्ण बिंदु इस भाव से देखे जाते हैं।

द्वितीय भाव:  द्वितीय भाव मूल रूप से धन का प्रतिनिधि है लेकिन इससे किसी भी व्यक्ति द्वारा अर्ज़ित की गयी शिक्षा की मात्रा सहित, पत्नी की आयु, संबंधित जातक के चेहरे की स्थिति, मारकेश आदि का भी पता चलता है।

तृतीय भाव: तीसरा स्थान मुख्यतः व्यक्ति के पराक्रम, उसकी हिम्मत तथा किसी भी कार्य को अंजाम देने के लिए उसकी क्षमता को दर्शाता है। इसके अलावा यही भाव सहोदर बड़े भाई की स्थिति भी बयां करता है।

चतुर्थ भाव: यह भाव भूमि, वाहन, भवन आदि की स्थिति दर्शाता है किंतु इससे विद्यार्जन की मात्रा का भी बखूबी अनुमान लगता है।

पंचम भाव: मंत्रणा शक्ति तथा संतान की मात्रा, गुणवत्ता आदि को यही भाव प्रदर्शित करता है।

षष्ठम भाव: रोग, ऋण और शत्रु की स्थिति को अच्छी तरह यही भाव दर्शाता है।

सप्तम भाव: इस भाव को प्रबलतम मारक भी कहते हैं किंतु यही स्थान जायेश भी है यानि पत्नी अथवा पति का भी प्रतिनिधि भी है। 

अष्टम भाव: आठवां स्थान मूल रूप से आयु का प्रतिनिधि है किंतु इस भाव से विरासत, सट्टा, शेयर, लॉटरी आदि का भी अनुमान लगाया जाता है।

नवां भाव: भाग्य का पूर्ण प्रतिनिधि यह भाव यश-पद-प्रतिष्ठा सहित पिता की स्थिति का अनुमान लगाने में सहायक है।

दशम् भाव: यह भाव वास्तविक रूप से आजीविका की स्थिति को बयां करता है। यानि जातक की जॉब, बिजनेस या पॉलिटिक्स से जीविका चलेगी अथवा किसी और रूप से। इसके साथ ही यह भाव भी पिता, यश-प्रतिष्ठा की स्थिति जानने के लिए महत्वपूर्ण है।

एकादश भाव: इस भाव से लाभ और एक्सिडेंट की स्थिति को डील किया जाता है। यानि जीवन में कब-कब लाभ (लाभ केवल धन का ही नहीं, अन्य क्षेत्रों को भी इसमें शामिल किया जाता है) की स्थिति बनेगी इसके साथ ही किसी दुर्घटना की स्थिति कब बनेगी, इसे इस भाव से जाना जाता है।

द्वादश भाव: बारहवां भाव मुख्यतः हानि और व्यय स्थान कहलाता है। यानि इस भाव से व्यक्ति के जीवन में आने वाले नुकसान और खर्च की स्थिति का अंदाज़ा लगाया जाता है साथ ही इससे विदेश गमन आदि स्थितियों की भी अवस्था जानी जाती है। 
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