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शक्ति का छठा रूप हैं मां कात्यायनी

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मां दुर्गा के छठे स्वरूप को कात्यायनी कहते हैं। यह महर्षि कात्यायन की कठिन तपस्या से प्रसन्न होकर उनकी इच्छानुसार उनके यहां पुत्री के रूप में पैदा हुई थीं। इस जन्म का उद्देश्य ऋषियों के कार्य को सिद्ध करना था। महर्षि ने इनका पालन-पोषण अपनी कन्या के रूप में किया। महर्षि कात्यायन की पुत्री और उन्हीं के द्वारा सर्वप्रथम पूजे जाने के कारण इन देवी का नाम कात्यायनी पड़ा। देवी कात्यायनी दानवों तथा पापियों का नाश करने वाली देवी हैं। वैदिक युग में ये ऋषि-मुनियों को कष्ट देने वाले दानवों को अपने तेज से ही नष्ट कर देती थीं। सांसारिक स्वरूप में यह सिंह पर सवार चार भुजाओं वाली सुसज्जित आभा मंडल युक्त देवी हैं। इनके बायें हाथ में कमल और तलवार व दाहिने हाथ में स्वस्तिक और आशीर्वाद की मुद्रा है। इन्हें प्रसन्न करने के लिए किसी बड़े आडंबर की जरूरत नहीं है। सच्चे मन से की गई आराधना और भक्ति इन्हें स्वयं ही भक्तों के पास खींच लाती हैं। मां कात्यायनी के विषय में एक कथा प्रचलित है। प्रसंग सती के आत्माहुति से जुड़ा हुआ है।

अपने पिता दक्ष की बातों से दुखी होकर सती यज्ञ की अग्नि में कूद गई थीं। क्रोधित महादेव सती के शरीर को लेकर जगह-जगह घूमने लगे। शिव के क्रोध की वजह से संसार में जन्म-मृत्यु की प्रक्रिया रुक गई। चिंतित देवता भगवान विष्णु के पास गए और उनसे कुछ उपाय करने को कहा। उसके बाद चक्रधारी भगवान विष्णु ने अपने चक्र से सती के अंगों का विच्छेद कर दिया। इससे शिव का मोह भंग हो गया। प्रत्येक अंग अलग-अलग स्थान पर गिरे। जिस स्थान पर सती के बाल (कात्या) गिरे, वहां देवी कात्यायनी की पूजा की जाने लगी। मां कात्यायनी अमोघ फलदायिनी हैं। मां कात्यायनी की पूजा तंत्र सिद्घि के लिए भी की जाती है।

इन्हें प्रसन्न किए बिना सिद्धि की प्राप्ति नहीं हो सकती। नवरात्र के छठे दिन साधक का मन 'आज्ञा चक्र' में स्थित रहता है। योग साधना में इस चक्र का अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान है। इस चक्र में स्थित मन वाला साधक मां कात्यायनी के चरणों में अपना सब कुछ न्योछावर कर देता है। इसके बाद भक्त को सहजभाव से मां कात्यायनी के दर्शन प्राप्त हो जाते हैं। इनका साधक इस लोक में रहते हुए भी अलौकिक तेज से युक्त रहता है।

 

उपासना मंत्र

चन्द्रहासोज्जवलकरा शाईलवरवाहना। कात्यायनी शुभं दद्याद्देवी दानवघातिनी।।

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